Tuesday, April 7, 2015

राष्ट्रीय परिचर्चा- टी आर पी न्यूज़ और बाज़ार



वरिष्ठ पत्रकार डॉ मुकेश कुमार की पुस्तक “टी आर पी न्यूज़ और बाज़ार” पर राष्ट्रीय परिचर्चा
लखनऊ यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के सभागार में  सोमवार को कुलपति एस. बी. निमसे की उपस्थिति में वरिष्ठ पत्रकार डॉ मुकेश कुमार की पुस्तक टी आर पी न्यूज़ एवं बाज़ार पर एक राष्ट्रीय परिचर्चा का आयोजन हुआ. इस परिचर्चा में टी आर पी के बारे में सबने अपनी राय रखी. इस पुस्तक के लेखक डॉ मुकेश जी ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए अपनी पुस्तक का परिचय दिया. इस पुस्तक में टी आर पी के परिचय से लेकर उसके इतिहास, विकास सबके बारे में गुणात्मक और संख्यात्मक विश्लेषण मौजूद है. डॉ मुकेश जी ने इसमें राष्ट्रीय सर्वे, पत्रकारों से सम्बंधित सर्वे और टी आर पी के आंकड़ो का विश्लेषण भी शामिल किया है. मुकेश जी ने यह भी बताया की कैसे टी आर पी बाज़ार का औजार है. और इसके आंकलन पद्धति पर भी सवाल है.
कमाल खान जी जो एक बहोत बड़े टी वी पत्रकार हैं एन डी टी वी में. कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने टी आर पी  पर अपने विचार रखे और कहा कि टी आर पी बढ़ने के लिए बहोत सारे हथकंडे अपनाये जाते हैं. जैसे एकता कपूर ने टी आर पी के लिए महाभारत में भगवान के कपडे मनीष मल्होत्रा से डिजाईन करवाए. कमाल खान जी ने कहा केवल 6% लोग न्यूज़ देखते है बाकि के 94% लोग केवल मनोरंजन वाले कार्यक्रम देखना पसंद करते हैं. लोगों को मनोरंजन के साथ साथ अच्छी व ज्ञानवर्धक चीजें भी देखनी चाहिए. तभी टी आर पी का सही आंकलन हो सकेगा.
विभाग के मुखिया व अध्यक्ष डॉ मुकुल श्रीवास्तव जी ने कहा पहले मीडिया में कोई प्रतियोगिता नहीं थी जिसका कारण था लोगों का यह मानना की अगर लड़ नहीं सकते तो जुड़ जाये. मगर अब धीरे धीरे इस प्रणाली में परिवर्तन आया है और लोग कम्पटीशन में आ रहे. और अब यह हाल है की लोग ब्राडकास्टिंग के लिए एजेंडा सेट करने लगे हैं. मुकुल जी ने कहा इनमे सुधार के लिए दो तरीके हैं पहला कि लोगों को शिक्षित कर जागरूक बनाया जाये और दूसरा न्यू मीडिया का सही उपयोग जिसके द्वारा हम अपने विचार रख सकते हैं.
श्याम कश्यप जी ने कहा की जैसे कविताओं और मुहावरों में कुछ जोड़ या घटा दें तो उसका प्रभाव बदलता है ठीक वैसे ही टी आर पी का भी हाल है. पुस्तक पर अपने विचार व्यक्त किये और कहा कि इस पुस्तक में टी आर पी के सारे रहस्यों पर से पर्दा हटा कर उसका उल्लेख करने के साथ ही बाज़ार और टी आर पी के सम्बन्ध को भी बताया है. किताब में कथा साहित्य जैसे लेख हैं जो रोचाकपूर्ण हैं. न्यूज़ और मीडिया समाज की सोच और नजरिये को बढ़ावा देता है टी आर पी भले ही कम हो लेकिन लोगों तक गलत बाते नहीं जानी चाहिए और टी आर पी बढ़ने के लिए झूठ का सहारा तो बिलकुल भी न ले. कश्यप जी बताते हैं की टी आर पी के तरीके में तो सुधार ला सकते हैं लेकिन इसके बेस को कभी नही बदल सकते क्युकी शुरुआत से ही ये प्रणाली चली आ रही है. अतः इस पुस्तक में एक आइडोलोजिकल तरीके से टी आर पी बदलाव का वृतांत व्यवहारिक परिपेक्ष्य बताया गया है.
आर सी त्रिपाठी जी के विचार से एक नयी समिति बने जिसमें न्यू मीडिया और टी आर पी का एक नया सिधांत बनाया जाये. पुस्तक में टी आर पी पर पूरी तरह रिसर्च करके इसके इतिहास विकास और प्रभाव को विस्तारपूर्वक बताया गया है.
कुलपति निमसे जी ने कहा की आलोचना करने से पहले टी आर पी क्या है क्यों हैं जान ले जिसके लिए इस पुस्तक को जरुर पढ़े. टी आर पी अगर गलत हुई तो ज्यादा नहीं चलेगा.
इस परिचर्चा में सुरभि यादव, पिंटू जुर्वरदार के साथ साथ विभाग के छात्रों ने भी पूरी तरह भाग लिया.

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