Sunday, March 22, 2015

किससे उम्मीद करें ?



दो दिन बाद घर जाना है. माँ से बोल दिया है की मेरे लिए अच्छी चीजें बनाना, भाई – बहन के एग्जाम ख़तम हो गए हैं तो मस्ती करने की पूरी तयारी है, रात भर बातें कुछ उनके भविष्य की तो कुछ अपने भविष्य की. ये भी सोच के रखा है इस बार पापा से अपने करियर की कुछ इम्पोर्टेन्ट बातें करुँगी और उनके सुझाव लुंगी. माँ के साथ पूरा समय बिताना है.
दो दिन बाद मुझे भी ट्रेन से ही सफ़र करना है. तो क्या मैं सुरक्षित घर पहुँच जाउंगी ? क्या ये सारे जो प्लान कर रखे हैं वास्तव में पूरे हो पाएंगे ? क्या गारंटी है की मेरी ट्रेन के इंजन का ब्रेक फेल नहीं होगा ? मेरी ही तरह आज हजारों लोग जो रोज रेल यात्रा करते हैं डरे हुए हैं . तो इन सब की जिम्मेदारी किसकी है ? हर साल ना जाने कितने रेल दुर्घटना के मामले सामने आते हैं कुछ दिनों तक तो यह राष्ट्रीय न्यूज़ बनी रहती है लोगों को मुआवज़े मिलते हैं कितने सारे अवेयरनेस कैंपेन होती है रेलवे दुर्घटना से बचाव के लिए लेकिन फिर भी ये हादसे कम नहीं होते आखिर क्यों ? क्या सच में ऐसे हादसों को किस्मत पे छोड़ देना चाहिए क्या ऐसे मिथ पर ही भरोसा कर लें की हाँ ये हादसा तो होना लिखा था इसीलिए हो गया . क्या मैं और मेरी तरह तमाम जनता केवल इस उम्मीद पर यात्रा करने निकले की अगर किस्मत में लिखा हुआ तो वापस आ जायेंगे जिंदा. ऐसे हजारों सवाल आज सबके मन में उठ रहे होंगे ? तो कौन देगा इसका जवाब ? वो ड्राईवर जो खुद चीख चीख कर कह रहा था की ब्रेक फेल हो गया है, क्या जवाब देगा, वो तो खुद ही अपनी सारी कोशिशें कर दिया था की ब्रेक लग जाये और हादसा टल जाये असिस्टेंट स्टेशन मास्टर और गार्ड को भी सूचित किया की कोई तो मदद मिल जाये लेकिन कही से कोई जवाब नहीं आया. जांच में बोल रहे की कट आउट कॉक किसी ने अनजाने में बंद कर दिया होगा ऐसे कैसे लापरवाही हो सकती है ?  क्या प्रशासन इसका जवाब देगा, जिम्मेदारी लेगा ? आखिर कौन बनेगा हमारी उम्मीद की हाँ अब हम सुरक्षित यात्रा कर लें.

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