Sunday, March 1, 2015

तेरे नाम .....


मैंने तो अब  तन्हा  रहना  सीख  लिया  था , तन्हाईयों  से  भी  बातें  करना  सीख  लिया  था।
फिर  धीरे  से  तुम  आये  इस  दिल  में, चुपके  से  मेरी  तन्हाईयों  को दूर  किया।
बहुत  कुछ  सिखा  तेरे  साथ, बहुत  कुछ  जाना  तेरे  साथ ,
शायद  बहुत  आगे   बढ़  गयी  थी तुझे लेकर  अपने  एहसासों  के  साथ।
सब  कुछ  जानती  थी  मैं , सब  कुछ  पता  था, फिर भी  न  जाने  क्यों  न  रोक  पाई  इस  दिल  को ,
पता  है  तेरे  दिल  में  भी  वही  प्यार  है  वही  एहसास  है ,
 पता  है  तू  भी  खुद  को  मेरी  तरह  ही  रोक  रहा  है ,
 ये  भी  जानती  हूँ  कि  तू  गलत  नहीं ,
 मगर  मैं  भी  गलत  नहीं  ये  बताऊँ कैसे।।।।।
खुद  को  यहीं  पर  रोकना  है  पर  रोकूँ  कैसे।।।।।।
बड़ी  मुश्किल  से  तो  ये  प्यार  हुआ , बड़ी मुश्किल  से  तो  ऐतबार हुआ ,
अब  इस  प्यार  को , इस  ऐतबार  को  रोकूँ  कैसे।।।।

याद  रखना 

ये  प्यार  कभी  न  कम  होगा, ये  ऐतबार भी  न  ख़त्म  होगा।
बस  कुछ  बाते  रह जाएँगी, कुछ  यादें रह  जाएँगी।
और  ये  हमारी  प्यारी  सी  दोस्ती  रह  जाएगी।
सारे  एहसासों  को  मैं  खुद  में सीमित  कर  लूंगी ,
सारे  सपनों  को मैं  खुद  में  कैद  कर  लूंगी।
 वक्त तो  लगेगा लेकिन  हाँ  इस  प्यार  को  यहीं  ख़त्म  कर  लूंगी।  


अलविदा।।।।।।

2 comments:

  1. अद्भुत निःशब्द ॥ मगर प्यार खत्म नहीं होता ।

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