चिट्टियाँ कलाइयाँ वे ओ बेबी मेरी चिट्टियाँ कलाइयाँ वे .....बड़ा ही प्रचलित
गाना है फिल्म रॉय का . एक और सोंग हो जाये ... गोरी हैं कलाइयाँ तू लादे मुझे
हरी चूड़ियाँ... क्यों भईया केवल गोरी कलाइयाँ ही होती हैं क्या ??? काली भी तो
हो सकती हैं ना ?? क्या हमारे यहाँ काली लड़कियां या सांवली लड़कियां नहीं होती हैं
?? फिर ऐसे रंगभेदी गाने क्यों ??
ये बातें कभी समझ में नहीं आई की ये जो श्वेत वर्ण पर इतना गौर किया जाता है
तो आखिर क्यों ? हमारे भारत में तो हर तरह की लड़कियां हैं . कोई गोरी हैं तो कोई
सांवली हैं तो कोई काली . लेकिन हर क्षेत्र में गोरी लड़कियों को महत्व दिया जाता है .
चाहे वो शादी हो या नौकरी , फ़िल्में हो या सेमिनार और कांफ्रेंस, यहाँ उन्ही
लड़कियों को आगे रखा जाता है जो दिखने में श्वेत होती हैं . काली या सांवली लड़कियों
को हमेशा back stage ही रखा जाता है या लिया ही नहीं जाता . ऐसे में ये श्याम वर्ण
लड़कियां कहाँ जाएँगी ??
शादी के लिए तो specially गोरी लड़कियों की मांग होती है . अगर लड़की सांवली हो
या काली होती है तो दहेज़ की मांग विशेष रूप से बढ़ जाती है . एक वाकया मेरे जान
पहचान में ही हुआ था उसका ज़िक्र करना चाहूंगी . एक लड़की रहती है जिसके नैन नक्श तो
बहुत अच्छे थे प्रतिभावान भी बहुत थी . परन्तु काली थी उसके भाई बहन सब गोरे थे .
उसकी दादी हमेशा उसे कोसती थी की ये कैसा श्राप परिवार में पैदा हो गयी अब इसके
दहेज़ के लिए भी पूँजी एकत्रित करना होगा और भी न जाने क्या क्या ??? फिर उसकी शादी
हुई तो उसके माँ बाप ने किसी तरह दहेज़ देकर उसे विदा किया सोचा बहुत खुश रहेगी .
लेकिन उसके ससुराल में भी उसके पति और सास हमेशा ताने देते , कहते दिखने में तो
सुन्दर नहीं कम से कम दहेज़ ही ले आती . इतने सारे ताने सुन सुन कर तंग आके उसने
कुछ ब्यूटी प्रोडक्ट्स इस्तेमाल कर लिए जिससे साइड इफ़ेक्ट हो गये और अब उसका इलाज़
कराना पड़ा. न जाने ऐसी कितनी घटनाएँ हमारे व आपके आस पास होती हैं .
बाज़ार में भी ये जो ब्यूटी प्रोडक्ट्स आ रहे हैं इनका भी मुख्य उद्देश्य इसी
बात पर होता है की “ इनकी क्रीम लगायें और इतने दिनों में गोरे हो जायें “ गोरे ही
होने पर फोकस क्यों ? गोरे होने की चाह में ही वो लड़की आज त्वचा सम्बन्धी रोग से
पीड़ित है और उसका इलाज़ चल रहा . अगर इतने ताने न मिलते उसे तो शायद ऐसे न होता .
फिल्मों और मनोरंजन की दुनिया में भी श्वेत लड़कियों को ज्यादा तवज्जो दी जाती
है . टी वी एंकर हो या रिपोर्टर , हेरोइनें हों या सेल्स गर्ल्स हर जगह गोरी
लड़कियों की ही मांग हैं . ऐसे में सावली व काली लड़कियों का आत्मविश्वास ख़त्म हो
जाता है . हुनर होने के बाद भी वो अपने में ही सिमट कर रह जाती हैं . जरुरत है इस
भेदभाव की समाप्ति का . हमारे आस पास ऐसे बहुत से उदहारण हैं जहाँ काली लड़कियां भी
आगे हैं देश का नाम रौशन कर रहीं . पी टी उषा के नाम से तो हम सब परिचित हैं . अगर
आज उनके प्रतिभा को रंगभेद की वजह से दबा दिया गया होता तो वह आज इतनी बड़ी अथेलेट
न होतीं . अतः ऐसी ही तमाम लड़कियां हैं जिनके अन्दर कुछ करने का, आत्म निर्भर होने
का और खुद को साबित करने का जज्बा होता है,
हुनर होता है, उन्हें केवल वर्ण की वजह से रोक देना कहाँ का न्याय है ?? उनके
सपनों को केवल इस वजह से चूर कर देना कि वो दिखने में सुन्दर नहीं और साँवली हैं, ये
कैसी मानवता है ??
keep it up............
ReplyDeleteये सब मानसिक गुलामी की निशानी है , अंग्रेजों की गुलामी से तो मुक्त हो गए लेकिन मानसिक गुलामी अभी भी है ॥ लंबी लड़ाई अभी बाकी है ।
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