Wednesday, February 18, 2015

Women are not the opportunity they are responsibility……


औरतें अवसर नहीं जिम्मेदारी हैं .... 

 

जब लोग ये समझ जायेंगे तो शायद हमारे समाज से कुछ बुराइया ख़तम हो जायें.  इसके लिए सबसे पहले जरुरी है ये समझना कि वो हैं कौन ???

आइये ज़िन्दगी के कुछ पहलुओ से रूबरू होते हैं. जब एक छोटा सा बच्चा पैदा होता है तो सबसे पहले वो किससे जुड़ता है. अरे जुड़ना छोडिये वो आता ही कहा से है एक औरत के गर्भ से जहाँ वो 9 महीने तक अपना आकार लेता है . फिर जब वो बाहर आता है तो जो सबसे पहले उसे अपनाती है वो भी वही औरत होती है उसकी माँ . कितने ही प्यार से वह माँ अपने उस बच्चे का पालन करती है. अच्छी अच्छी बातें सिखाती है . जब वह बीमार होता है तो रात रात भर जगती है. अच्छे से अच्छी परवरिश देती है. अब जो दूसरी औरत उसके संपर्क में आती है वो है उसकी बहन. वो बहन भी बिना कुछ डिमांड किये केवल उस भाई की रक्षा करती है उसके साथ खेलती है शैतानी करती है और उसके हिस्से की डांट भी सुनती है . फिर वह और भी बड़ा होता है तो उसकी दोस्ती होती है किसी लड़की से . वह लड़की उसे क्लास के नोट्स देती है . प्रोजेक्ट्स पूरे करवाती है, एग्जाम में उसकी मदद करती है. फिर जब उसकी शादी होती है तो वो उसकी पत्नी होती है जो हर कदम पर उसका साथ देती है. लेकिन जब उसी के घर बात आती है कि लड़की का जन्म हो या लड़के का तो वो लड़के को चुनता है. क्या यहाँ वह भूल जाता है कि ज़िन्दगी की शुरुआत से लेकर हर उस महत्वपूर्ण पहलुओं पर सबसे पहले जिसने साथ दिया वो एक औरत ही थी . औरत न होती तो शायद उसका जन्म भी न हुआ होता . यही नहीं जब वह बाहर जाता है तो दूसरी औरतों से ऐसे व्यवहार करता है जैसे वो उनकी जागीर हों. क्या वो परवरिश, वो सीख, वह भूल जाता है . 

मैं केवल पुरुषों को ही दोषी नहीं मानती इसका . औरतें भी पूरी तरह से जिम्मेदार हैं . अगर पुरुष उनके साथ कुछ गलत करते हैं जैसे घरेलु हिंसा या बलात्कार तो औरतें भी चुप रहकर उनका साथ देती हैं . या अगर कोई औरत इनके खिलाफ आवाज़ उठाती है तो दूसरी औरतें उसे दबाने की कोशिश करतीं हैं. हर दो घंटे में एक बलात्कार का मामला सामने आता है . ये वो केस है जो सामने आते हैं बहोत से केस तो ऐसे भी होते हैं जिन्हें दबा दिया जाता है वजह कोई भी हो पर या तो पुलिस वाले या उस लड़की के घर वाले पीछे हट जाते हैं.  

सबसे संगीन मामला है right to birth of a girl child. इसमें भी औरत और पुरुष मिलके जिम्मेदार हैं . सत्यमेव जयते का एक एपिसोड याद आता है जिसमे एक आई ए एस के घर लड़की पैदा होती है तो उस आई ए एस की माँ को इतनी दिक्कत होती है की उस लड़की को सीढियों से धक्का दे देती है . ऐसे तमाम वाकये हमारे और आपके आस पास भी देखने को मिलते ही होंगे . यही वजह है की आज भारत में लड़के व लड़कियों के अनुपात में इतनी कमी आई है. मैं कहीं और की बात क्या कहूँ जब हमारे देश की राजधानी में ही यह आंकड़ा 868 females per 1000 males है . बाकी के शहरों में भी यह आंकड़े कुछ इसी प्रकार ही हैं. 

अब बात आती है शिक्षा की तो सबको बराबर की शिक्षा देने के साथ साथ सोच को भी बदलने की सीख देनी चाहिए क्योंकि ये जो समस्याएं हैं न वास्तव में यह समस्याएं नहीं हमारे व आपके द्वारा उत्पन्न की गयी सोच है जिसे हम व आप मिलकर ही बदल सकते हैं. जैसे अगर कोई लड़की बाहर जाती है या कुछ भी करती है तो घर वाले पूरी निगरानी रखते हैं ऐसे ही लड़कों की भी सारी हरकतों पर पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए. यहीं बात आती है right to equality. अगर हम इन जिम्मेदारियों को समझ लें और एक दूसरे के प्रति जिम्मेदार हो जायें तो शायद समाज को एक नयी दिशा, एक नया मोड़ मिल जाये.
 

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