Friday, May 22, 2015

एक सोच देश के विकास की ओर



यूँ तो हमारे देश में भगवान की आस्था के नाम पर लोग बहुत बड़े बड़े दान करते आये हैं, कभी हजारों लीटर के दूध से शिवलिंग का पूजन जो ऐसे ही बहा दिया जाता है, तो कभी मजारों पर चादर. लोग ये नहीं सोचते की ये दान जो मंदिरों और मस्जिदों में कर रहे वह किसी गरीब को दे तो कितना विकास होगा. ठीक उसी तरह मंदिरों में सोने के चढ़ावे का भी प्रचलन है.
हिन्दुओं का बहुत ही विख्यात त्यौहार है अक्षय तृतीया. इस दिन भारी मात्रा में हिन्दुओं द्वारा सोना ख़रीदा जाता है. साल में आने वाले और भी कई ऐसे त्यौहार हैं जिनमें हिन्दुओं द्वारा उसके पहले सोना खरीदना शुभ मानते हैं. इसके अलावा भक्ति और आस्था के नाम पर मंदिरों में भी सोना चढ़ाया जाता है. जिसकी वजह से हर साल सैकड़ों मात्रा में सोने का आयात होता है. अभी हाल ही में वर्ष 2014-15 में करीब 850 टन सोना भारत में आयात किया गया. इतनी भारी मात्रा के आयात के बाद भी भारत सरकारी खजाने में केवल 557.7 टन सोना है और बाकि का सोना निजी लॉकरों में, मंदिरों में चढ़ावे के रूप में निष्क्रिय पड़ा हुआ है जिनकी अनुमानित मात्रा 22,000 टन है जो दुनिया के नम्बर वन सोने का भंडार कहे जाने वाले अमेरिका जिसके पास 8,133.5 टन सोन है, से कहीं ज्यादा है.
सवाल ये उठता है कि इतने बड़े मात्रा में यह पूंजी होने का बाद भी यह है कहाँ? और इसका कोई उपयोग क्यों नहीं होता? हमारा देश मान्यताओं और भक्ति आस्था का देश है. यहाँ भक्ति व आस्था के नाम पर लोग बड़े से बड़ा दान मंदिरों में कर देते हैं. इसी का एक रूप है सोना. जो मंदिरों में भगवान के जेवरों, मुकुट, चरण पादुकाओं के रूप में मंदिर के ट्रस्ट में मौजूद है. बहुत सारे प्रचलित मंदिर है जैसे तिरुमाला के श्री वेंकटेश्वर मंदिर, मुंबई का प्रसिद्ध सिध्ही विनायक और श्री शिर्डी के साईं बाबा मंदिर, तिरुअनंतपुरम का श्री पदमनाभास्वामी मंदिर, और ऐसे ही और कई मंदिर सोने के अथाह भंडार को संजोये हुए हैं, जिन्हें लोग भक्त प्रसाद के नाम पर छूने तक नहीं देते. कुछ थोड़ा बहुत लोग अपनी परंपरा के नाम पर अपने पास सोना सहेज कर रखते.
भारत सरकार अब इन्ही निष्क्रिय पड़ी पूंजी का मुद्रीकरण करने की सोच रही है. और बिलकुल हमें पूरा सहयोग करना चाहिए. क्यूंकि जब ये पूंजी सर्कुलेशन में आएगा तो सरकार के एक्स्पेंडीचर और रेवेन्यु का अंतर भी कम होगा जिससे देश के आर्थिक विकास में मदद मिलेगी. सरकार ने निवेश के कुछ विकल्प दिए हैं जिनमे सोने को बैंक में जमा करके उनपर ब्याज लिया जाये और वह ब्याज कर मुक्त होगा, सोने के बांड जिन्हें बाद में बेचा जा सके आदि. वित्तीय विश्लेषकों के अनुसार और जैसा हिमाचल सरकार ने अपने एक्ट में लागू किया, इन एकत्र किये हुए भंडार का कुछ प्रतिशत जैसे की 10 फीसदी मंदिर के विकास में, 20 प्रतिशत तक बैंक में जमा कर दें, और 20 प्रतिशत अपने पास रखने के बाद बाकि बचे 50 प्रतिशत को मेटल्स व मिनरल्स की मदद से पिघलाकर सोने की पट्टियों, छड़ो व सिक्को में बदलकर नीलामी करवा देनी चाहिए जिससे इस पूंजी की एक बहुत बड़ी मात्रा सर्कुलेशन में आ जाये और सरकार इसका उपयोग देश विकास में कर सके.
यह तो तय है कि भारत के 80 फीसदी लोग इसका विरोध करेंगे क्यूंकि वे इसे अपनी आस्था और परंपरा पर चोट के समान लेंगे. बस यहीं जरुरत है सोच में बदलाव लाने की. लोग ये क्यों नहीं समझते कि भगवान को ये बड़े बड़े चढ़ावे की जरुरत नहीं. बस मन को साफ़ और जरूरतमंद लोगों की मदद करने मात्र से भगवान की भक्ति और पूजा पूर्ण हो जाती है.
हमें बस इतना करना है कि अपनी इन दकियानूसी सोच को बदल कर सरकार का सहयोग देना है जिससे हमारा देश विकासशील देश की श्रेणी से उठकर विकसित देश की श्रेणी में आ जाये.

Saturday, April 18, 2015

पत्र



प्रिय किसान
बहुत दुःख हुआ यह जानकर की मेरी वजह से तुम्हारी पूरी मेहनत, तुम्हारी कमाई सब कुछ बर्बाद हो गयी. मैं समझ सकती हूँ क्या बीत रही होगी तुम्हारे परिवार पर खासकर तुम पर जब हर रोज मेरे बादल आते हैं और बारिश से तुम्हारी फसलों को नुकसान कर जाते हैं. अभी तो फसल तैयार ही हुई थी तुम्हारी और तब तक मेरा कहर.. अब तक तो सत्तर फीसदी फसल बर्बाद हो चुकी है. अलग अलग राज्यों में आंकड़े अलग अलग, सबसे ज्यादा तो उत्तर भारत में मेरा कहर है. बाढ़ की वजह से तो लोग बेघर ही हो गये. तुम्हे लग रहा होगा की मैं कितनी क्रूर हो गयीं हूँ तुम्हारे प्रति, तुम्हारे दुःख का सबसे बड़ा कारण तुम मुझे ही समझ रहे होगे. तुम्हे याद है कैसे तुम हर साल सावन में मेरा बेसब्री से इंतज़ार करते थे और मेरे आने का जश्न मनाते थे. मगर अब मेरा आना तुम्हे बिलकुल भी रास न आता, तुम्हारा दिल थम जाता क्योंकि अब मेरा आना अनियमित हो गया है कभी भी आ जाते हैं मेरे बादल. मैं जान बुझ कर ऐसा नहीं करती, क्योंकि अब भी मैं वही तुम्हारी पुरानी दोस्त हूँ जो तुम्हे फसलों को लहलहाते हुए देखकर तुम्हारी ख़ुशी से सुकून महसूस करती थी. और आज तुम्हारे दुःख से उतना ही दुःख भी हो रहा है.
तुम्हारे ही तरह मेरे और भी दोस्त हैं जैसे गौरैया, ये सारी प्रजातियाँ तो मानो विलुप्त ही हो गयी हैं . इन सबका कारण तो तुमसे भी छुपा नही होगा. इस पत्र के ज़रिये मैं बस यही बताना चाहती हूँ की मैं तुम्हारी प्रकृति अभी भी वही हूँ बस तुम्हारे मानव भाइयों द्वारा किये जा रहे प्रदूषण से मेरी भी दिनचर्या ख़राब हो गयी है. मैं समझ रही हूँ की ये सारे प्रयास विकास की ओर ही हैं, ये सारी इन्टरनेट तरंगे जिसकी वजह से खासकर पक्षियों पर प्रभाव पड़ा है, तुम्हे एक विकसित देश की ओर अग्रसर करेंगी. और बिलकुल मुझे बहोत ख़ुशी होती है तुम लोगों की कामयाबी से. बस मैं इतना कहना चाहती हूँ की सारे प्रयोग करो खूब आगे बढ़ो मगर प्रकृति को अनदेखा न करो. जितना हो सके वृक्ष लगाओ, साफ़ सफाई पर ध्यान दो. पुनर्चक्रण विधि का जितना हो सके प्रयोग करो. अब तो मानव और भी समझदार हो गया है तो अपनी सूझ बूझ विकास के साथ साथ वातावरण के योगदान में भी लगाओ. क्योंकि जब तक तुम लोग सहयोग नहीं करोगे मैं भी कुछ नहीं कर सकती.
कितने सारे किसान हर रोज मर रहें हैं. यह आंकड़ा भी 50 से 60 हर रोज का है. रोज मेरे दोस्तों को मरता देख कर मुझे भी अपार दुःख होता है. मेरे दोस्त मरना किसी समस्या का हल नहीं. सोचो तुम्हारे पीछे तुम्हारे परिवार उनका क्या हाल होगा. यहाँ तक की तुम लोगों की ज़मीन जायदाद तक छिनने की नौबत आ गयी, ऐसे में मैं बस यही कहूँगी की हिम्मत मत हारो, मेरा सहयोग करो अपने दुसरे मित्रों को जागरूक करो की वह भी प्रकृति के प्रति जिम्मेदार हों. फिर से कोशिश करो सब ठीक हो जायेगा. तुम्हारे घर तुम्हारी फसलें तुम्हारा परिवार सब तरक्की करेंगें. याद रखना मैं और मेरी दुआएं हमेशा तुम्हारे साथ है.
तुम्हारी प्यारी दोस्त
प्रकृति

Wednesday, April 8, 2015

पहिया.. ज़िन्दगी का



किसी ने ठीक ही कहा है “ज़िन्दगी का पहिया बदस्तूर सरकता रहता है जीवन में परिवर्तन का दौर चलता रहता है.” परिवर्तन जरुरी भी है तभी हम ज़िन्दगी के अलग अलग आयामों से खुद को परिचित करा पाएंगे. ज़िन्दगी का पहिया शुरू होता है हमारे जन्म से और हमारी मृत्यु पर जाकर रुकता है. इस पूरे सफ़र में हम ज़िन्दगी के कई दौर से गुजरते हैं. और हर दौर में ठीक पहिये जैसी छाप हमारी ज़िन्दगी में रह जाती है. जीवन के शुरूआती दौर में हमें सबसे प्यारी यादें मिलती हैं क्युकी वो हमारा बचपन होता है. हम दुनिया को देखते हैं सीखते हैं. उस समय हमारा विकास बहुत तेजी से होता है, अपने परिवार के साथ बिताया हुआ सबसे हसीं पल. फिर पहिया थोडा आगे बढ़ता है पीछे हमारी शैतानियों, बदमाशियों, लाड प्यार की छाप छोड़ते हुए. अब हम थोड़े बड़े होते हैं, स्कूल जाते हैं. वो दौर भी सबसे अच्छा होता है सुकून से भरा. स्कूल के दोस्त, टीचर, होमवर्क, क्लास टेस्ट, घर आके माँ का प्यार सब एक अलग ही अनुभव करा जाते हैं. इन् दरमियाँ हमारे भाई बहन का भी बहुत अच्छा रोल होता है. गर्मी की छुट्टियों में इन लोगों के साथ सारी शैतानियाँ करना, खेल कूद करना इत्यादि. फिर समय के साथ यह पहिया आगे बढ़ता है ज़िन्दगी का. और नए लोग जुड़ते हैं हमारे जीवन में. यह हमारी ज़िन्दगी का वह दौर होता है जब हम सिखने के साथ साथ समाज में अपना भी योगदान देते हैं. लोगों के पक्षों को सुनने के साथ साथ अपना भी मत देते हैं और तब हमारी सामाजिक जिम्मेदारी बढ़ जाती है. हमारे कुछ लक्ष्य बनने लगते हैं जिन्हें हम पूरा करते हैं. कुछ लोग आसानी से सोशल हो जाते हैं तो कुछ अपने में ही सिमट के रह जाते हैं. पहिया और आगे बढ़ता है अब हमारे ऊपर हमारे परिवार की जिम्मेदारी आती है, शादी होती है एक नयी ज़िन्दगी शुरू होती है. सारी जिम्मेदारियां ऑफिस से लेकर घर तक पूरी करते हुए कुछ लोग उन्हें भूल जाते हैं जिनका ज़िन्दगी के पहिये को चलाने में सबसे बड़ा योगदान है, हमारे माँ बाप. वो भी हमारा ही परिवार हैं जिनकी हर मोड़ पर हमें जरुरत होती है. एक दिन हम भी इसी दौर से गुजरेंगे जिससे वो गुजर रहे. जो आज उनका है वो हमारा कल होगा शायद इसी को कहते हैं ज़िन्दगी का पहिया. जो चलता रहता है और कभी किसी के लिए रुकता नहीं. ज़िन्दगी के इन् सभी पड़ाव से गुजरते हुए हमें बहुत से लोग मिलते हैं कुछ हमेशा के लिए साथ रह जाते हैं तो कुछ की बस यादें रह जाती हैं. कुछ लोगों के मिलने से ज़िन्दगी एकदम बदल जाती है और एक नयी पहचान मिलती है लेकिन ज़िन्दगी कभी रूकती नहीं है. परिवर्तन होता रहता है ज़िन्दगी में. शायद इसी का नाम है ज़िन्दगी. जीवन का पहिया एक ही बार घूमता है और ये कभी बैक गियर नहीं लेता अतः ये हमारी जिम्मेदारी है की हम अपने इस जीवन को कितना सार्थक बनाये. ज़िन्दगी तो जानवरों की भी होती है लेकिन हमें ज़िन्दगी केवल जीना नहीं बल्कि कुछ ऐसा करना है की हमारा वजूद हमारी ज़िन्दगी का पहिया लोगों के जीवन में भी अपना छाप छोड़ जाये.
ज़िन्दगी का पहिया गोल है..
आज तू ऊपर कल मैं..
दूसरों को क्यों दुःख देता है...
नसीब बदलती है एक पल में...
अब बात आती है आखिरी दौर की  जैसे पहिया चलते चलते घिस जाता है वैसे ही हमारी ज़िन्दगी का पहिया भी चलते चलते एक दिन घिस जाता है वह होता है हमारे जीवन का अंत और इस पहिये को उसका ब्रेक मिल जाता है.

Tuesday, April 7, 2015

राष्ट्रीय परिचर्चा- टी आर पी न्यूज़ और बाज़ार



वरिष्ठ पत्रकार डॉ मुकेश कुमार की पुस्तक “टी आर पी न्यूज़ और बाज़ार” पर राष्ट्रीय परिचर्चा
लखनऊ यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के सभागार में  सोमवार को कुलपति एस. बी. निमसे की उपस्थिति में वरिष्ठ पत्रकार डॉ मुकेश कुमार की पुस्तक टी आर पी न्यूज़ एवं बाज़ार पर एक राष्ट्रीय परिचर्चा का आयोजन हुआ. इस परिचर्चा में टी आर पी के बारे में सबने अपनी राय रखी. इस पुस्तक के लेखक डॉ मुकेश जी ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए अपनी पुस्तक का परिचय दिया. इस पुस्तक में टी आर पी के परिचय से लेकर उसके इतिहास, विकास सबके बारे में गुणात्मक और संख्यात्मक विश्लेषण मौजूद है. डॉ मुकेश जी ने इसमें राष्ट्रीय सर्वे, पत्रकारों से सम्बंधित सर्वे और टी आर पी के आंकड़ो का विश्लेषण भी शामिल किया है. मुकेश जी ने यह भी बताया की कैसे टी आर पी बाज़ार का औजार है. और इसके आंकलन पद्धति पर भी सवाल है.
कमाल खान जी जो एक बहोत बड़े टी वी पत्रकार हैं एन डी टी वी में. कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने टी आर पी  पर अपने विचार रखे और कहा कि टी आर पी बढ़ने के लिए बहोत सारे हथकंडे अपनाये जाते हैं. जैसे एकता कपूर ने टी आर पी के लिए महाभारत में भगवान के कपडे मनीष मल्होत्रा से डिजाईन करवाए. कमाल खान जी ने कहा केवल 6% लोग न्यूज़ देखते है बाकि के 94% लोग केवल मनोरंजन वाले कार्यक्रम देखना पसंद करते हैं. लोगों को मनोरंजन के साथ साथ अच्छी व ज्ञानवर्धक चीजें भी देखनी चाहिए. तभी टी आर पी का सही आंकलन हो सकेगा.
विभाग के मुखिया व अध्यक्ष डॉ मुकुल श्रीवास्तव जी ने कहा पहले मीडिया में कोई प्रतियोगिता नहीं थी जिसका कारण था लोगों का यह मानना की अगर लड़ नहीं सकते तो जुड़ जाये. मगर अब धीरे धीरे इस प्रणाली में परिवर्तन आया है और लोग कम्पटीशन में आ रहे. और अब यह हाल है की लोग ब्राडकास्टिंग के लिए एजेंडा सेट करने लगे हैं. मुकुल जी ने कहा इनमे सुधार के लिए दो तरीके हैं पहला कि लोगों को शिक्षित कर जागरूक बनाया जाये और दूसरा न्यू मीडिया का सही उपयोग जिसके द्वारा हम अपने विचार रख सकते हैं.
श्याम कश्यप जी ने कहा की जैसे कविताओं और मुहावरों में कुछ जोड़ या घटा दें तो उसका प्रभाव बदलता है ठीक वैसे ही टी आर पी का भी हाल है. पुस्तक पर अपने विचार व्यक्त किये और कहा कि इस पुस्तक में टी आर पी के सारे रहस्यों पर से पर्दा हटा कर उसका उल्लेख करने के साथ ही बाज़ार और टी आर पी के सम्बन्ध को भी बताया है. किताब में कथा साहित्य जैसे लेख हैं जो रोचाकपूर्ण हैं. न्यूज़ और मीडिया समाज की सोच और नजरिये को बढ़ावा देता है टी आर पी भले ही कम हो लेकिन लोगों तक गलत बाते नहीं जानी चाहिए और टी आर पी बढ़ने के लिए झूठ का सहारा तो बिलकुल भी न ले. कश्यप जी बताते हैं की टी आर पी के तरीके में तो सुधार ला सकते हैं लेकिन इसके बेस को कभी नही बदल सकते क्युकी शुरुआत से ही ये प्रणाली चली आ रही है. अतः इस पुस्तक में एक आइडोलोजिकल तरीके से टी आर पी बदलाव का वृतांत व्यवहारिक परिपेक्ष्य बताया गया है.
आर सी त्रिपाठी जी के विचार से एक नयी समिति बने जिसमें न्यू मीडिया और टी आर पी का एक नया सिधांत बनाया जाये. पुस्तक में टी आर पी पर पूरी तरह रिसर्च करके इसके इतिहास विकास और प्रभाव को विस्तारपूर्वक बताया गया है.
कुलपति निमसे जी ने कहा की आलोचना करने से पहले टी आर पी क्या है क्यों हैं जान ले जिसके लिए इस पुस्तक को जरुर पढ़े. टी आर पी अगर गलत हुई तो ज्यादा नहीं चलेगा.
इस परिचर्चा में सुरभि यादव, पिंटू जुर्वरदार के साथ साथ विभाग के छात्रों ने भी पूरी तरह भाग लिया.

Sunday, March 22, 2015

किससे उम्मीद करें ?



दो दिन बाद घर जाना है. माँ से बोल दिया है की मेरे लिए अच्छी चीजें बनाना, भाई – बहन के एग्जाम ख़तम हो गए हैं तो मस्ती करने की पूरी तयारी है, रात भर बातें कुछ उनके भविष्य की तो कुछ अपने भविष्य की. ये भी सोच के रखा है इस बार पापा से अपने करियर की कुछ इम्पोर्टेन्ट बातें करुँगी और उनके सुझाव लुंगी. माँ के साथ पूरा समय बिताना है.
दो दिन बाद मुझे भी ट्रेन से ही सफ़र करना है. तो क्या मैं सुरक्षित घर पहुँच जाउंगी ? क्या ये सारे जो प्लान कर रखे हैं वास्तव में पूरे हो पाएंगे ? क्या गारंटी है की मेरी ट्रेन के इंजन का ब्रेक फेल नहीं होगा ? मेरी ही तरह आज हजारों लोग जो रोज रेल यात्रा करते हैं डरे हुए हैं . तो इन सब की जिम्मेदारी किसकी है ? हर साल ना जाने कितने रेल दुर्घटना के मामले सामने आते हैं कुछ दिनों तक तो यह राष्ट्रीय न्यूज़ बनी रहती है लोगों को मुआवज़े मिलते हैं कितने सारे अवेयरनेस कैंपेन होती है रेलवे दुर्घटना से बचाव के लिए लेकिन फिर भी ये हादसे कम नहीं होते आखिर क्यों ? क्या सच में ऐसे हादसों को किस्मत पे छोड़ देना चाहिए क्या ऐसे मिथ पर ही भरोसा कर लें की हाँ ये हादसा तो होना लिखा था इसीलिए हो गया . क्या मैं और मेरी तरह तमाम जनता केवल इस उम्मीद पर यात्रा करने निकले की अगर किस्मत में लिखा हुआ तो वापस आ जायेंगे जिंदा. ऐसे हजारों सवाल आज सबके मन में उठ रहे होंगे ? तो कौन देगा इसका जवाब ? वो ड्राईवर जो खुद चीख चीख कर कह रहा था की ब्रेक फेल हो गया है, क्या जवाब देगा, वो तो खुद ही अपनी सारी कोशिशें कर दिया था की ब्रेक लग जाये और हादसा टल जाये असिस्टेंट स्टेशन मास्टर और गार्ड को भी सूचित किया की कोई तो मदद मिल जाये लेकिन कही से कोई जवाब नहीं आया. जांच में बोल रहे की कट आउट कॉक किसी ने अनजाने में बंद कर दिया होगा ऐसे कैसे लापरवाही हो सकती है ?  क्या प्रशासन इसका जवाब देगा, जिम्मेदारी लेगा ? आखिर कौन बनेगा हमारी उम्मीद की हाँ अब हम सुरक्षित यात्रा कर लें.