यूँ तो हमारे देश में भगवान की आस्था के नाम पर लोग बहुत बड़े बड़े दान करते आये
हैं, कभी हजारों लीटर के दूध से शिवलिंग का पूजन जो ऐसे ही बहा दिया जाता है, तो
कभी मजारों पर चादर. लोग ये नहीं सोचते की ये दान जो मंदिरों और मस्जिदों में कर
रहे वह किसी गरीब को दे तो कितना विकास होगा. ठीक उसी तरह मंदिरों में सोने के
चढ़ावे का भी प्रचलन है.
हिन्दुओं का बहुत ही विख्यात त्यौहार है अक्षय तृतीया. इस दिन भारी मात्रा में
हिन्दुओं द्वारा सोना ख़रीदा जाता है. साल में आने वाले और भी कई ऐसे त्यौहार हैं
जिनमें हिन्दुओं द्वारा उसके पहले सोना खरीदना शुभ मानते हैं. इसके अलावा भक्ति और
आस्था के नाम पर मंदिरों में भी सोना चढ़ाया जाता है. जिसकी वजह से हर साल सैकड़ों
मात्रा में सोने का आयात होता है. अभी हाल ही में वर्ष 2014-15 में करीब 850 टन
सोना भारत में आयात किया गया. इतनी भारी मात्रा के आयात के बाद भी भारत सरकारी
खजाने में केवल 557.7 टन सोना है और बाकि का सोना निजी लॉकरों में, मंदिरों में
चढ़ावे के रूप में निष्क्रिय पड़ा हुआ है जिनकी अनुमानित मात्रा 22,000 टन है जो
दुनिया के नम्बर वन सोने का भंडार कहे जाने वाले अमेरिका जिसके पास 8,133.5 टन सोन
है, से कहीं ज्यादा है.
सवाल ये उठता है कि इतने बड़े मात्रा में यह पूंजी होने का बाद भी यह है कहाँ?
और इसका कोई उपयोग क्यों नहीं होता? हमारा देश मान्यताओं और भक्ति आस्था का देश
है. यहाँ भक्ति व आस्था के नाम पर लोग बड़े से बड़ा दान मंदिरों में कर देते हैं.
इसी का एक रूप है सोना. जो मंदिरों में भगवान के जेवरों, मुकुट, चरण पादुकाओं के
रूप में मंदिर के ट्रस्ट में मौजूद है. बहुत सारे प्रचलित मंदिर है जैसे तिरुमाला
के श्री वेंकटेश्वर मंदिर, मुंबई का प्रसिद्ध सिध्ही विनायक और श्री शिर्डी के
साईं बाबा मंदिर, तिरुअनंतपुरम का श्री पदमनाभास्वामी मंदिर, और ऐसे ही और कई मंदिर
सोने के अथाह भंडार को संजोये हुए हैं, जिन्हें लोग भक्त प्रसाद के नाम पर छूने तक
नहीं देते. कुछ थोड़ा बहुत लोग अपनी परंपरा के नाम पर अपने पास सोना सहेज कर रखते.
भारत सरकार अब इन्ही निष्क्रिय पड़ी पूंजी का मुद्रीकरण करने की सोच रही है. और
बिलकुल हमें पूरा सहयोग करना चाहिए. क्यूंकि जब ये पूंजी सर्कुलेशन में आएगा तो
सरकार के एक्स्पेंडीचर और रेवेन्यु का अंतर भी कम होगा जिससे देश के आर्थिक विकास
में मदद मिलेगी. सरकार ने निवेश के कुछ विकल्प दिए हैं जिनमे सोने को बैंक में जमा
करके उनपर ब्याज लिया जाये और वह ब्याज कर मुक्त होगा, सोने के बांड जिन्हें बाद
में बेचा जा सके आदि. वित्तीय विश्लेषकों के अनुसार और जैसा हिमाचल सरकार ने
अपने एक्ट में लागू किया,
इन एकत्र किये
हुए भंडार का कुछ प्रतिशत जैसे की 10 फीसदी मंदिर के विकास में, 20 प्रतिशत तक
बैंक में जमा कर दें, और 20 प्रतिशत
अपने पास रखने के बाद बाकि बचे 50 प्रतिशत को मेटल्स व मिनरल्स की मदद से पिघलाकर
सोने की पट्टियों, छड़ो व सिक्को में
बदलकर नीलामी करवा देनी चाहिए जिससे इस पूंजी की एक बहुत बड़ी मात्रा सर्कुलेशन में
आ जाये और सरकार इसका उपयोग देश विकास में कर सके.
यह तो तय है कि भारत के 80 फीसदी लोग इसका विरोध करेंगे क्यूंकि वे इसे अपनी
आस्था और परंपरा पर चोट के समान लेंगे. बस यहीं जरुरत है सोच में बदलाव लाने की.
लोग ये क्यों नहीं समझते कि भगवान को ये बड़े बड़े चढ़ावे की जरुरत नहीं. बस मन को
साफ़ और जरूरतमंद लोगों की मदद करने मात्र से भगवान की भक्ति और पूजा पूर्ण हो जाती
है.
हमें बस इतना करना है कि अपनी इन दकियानूसी सोच को बदल कर सरकार का सहयोग देना
है जिससे हमारा देश विकासशील देश की श्रेणी से उठकर विकसित देश की श्रेणी में आ
जाये.
wow ...so nice and true too...
ReplyDeletenice yar ye baate sabko janani chaiyeeee....
ReplyDeletenice
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